आंशु वह नही जो बरसती रहे
उसकी सार्थकता तो बस दो बूंदों में ही है
जो हृदय को चीरती भी है
बाँध को तोरती भी है,
फिर भी गिरती है
बस दो बूंदों के रूप में ही !
या कभी वह भी नही
बस पलकें ही गीला करती है !!
जो बसकर कर गिरे , वो घरियाली है
और जो गिर कर भी न दिखाई दे , वही आंशु है!!!
Wednesday, November 11, 2009
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मुझे जयशंकर प्रसाद जी की कविता आसू याद आ गयी बहुत खूब।
ReplyDeleteDhnyabaad mishra jee.........
ReplyDeleteस्वागत है आपका!!
ReplyDeleteनिरंतर लिखते रहें.
-सुलभ (यादों का इंद्रजाल)
हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
ReplyDeleteकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढ़े और अपनी बहुमूल्य
टिप्पणियां करें
बेहतर प्रयास.
ReplyDeleteजारी रहें. शुभकामनाएं.
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महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!
narayan narayan
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