Wednesday, November 11, 2009

आंशु

आंशु वह नही जो बरसती रहे
उसकी सार्थकता तो बस दो बूंदों में ही है
जो हृदय को चीरती भी है
बाँध को तोरती भी है,
फिर भी गिरती है
बस दो बूंदों के रूप में ही !
या कभी वह भी नही
बस पलकें ही गीला करती है !!
जो बसकर कर गिरे , वो घरियाली है
और जो गिर कर भी न दिखाई दे , वही आंशु है!!!

6 comments:

  1. मुझे जयशंकर प्रसाद जी की कविता आसू याद आ गयी बहुत खूब।

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  2. स्वागत है आपका!!
    निरंतर लिखते रहें.
    -सुलभ (यादों का इंद्रजाल)

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  3. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढ़े और अपनी बहुमूल्य
    टिप्पणियां करें

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