उससे मुलाकात तो अधूरी थी ,
दिल में जज्बात मगर पूरे थे !
गुलशन में खरी सायद वो अकेली थी ,
लगा कोई उलझी हुई पहेली थी !
गगन के तारों से बालो को सजाया था उसने ,
बाल काले बहुत छोटे थे , गेसूओं में गंध मगर पूरी थी !
किसी शिल्पकार की मूर्ति की तरह सायद वो अबोली थी
तन ढका था उसका मगर , उभार उसमें पूरे थे !
मैं दौरा की उसको अपनी बाँहों में भर सकूं ,
उसके नर्म ओठों को गति दे सकूं ,
मगर आँख खुली तो पाया ,वो मेरा सपना था ,
माना वो मेरा सपना था , सचाई उसमें मगर पूरी थी !!
Tuesday, November 10, 2009
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Wow ! Hemant Sir ... loved this one.
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