जाने वाले अनजान पथिक ,रुक देख जरा मुर कर पीछे
तेरे राह के कोने में एक बेबस और लाचार परा है !!
तन मन दोनों से विकलांग हो ,राह तुम्हारी देख रहा है
राह देखते उन नयनों की दो बूँदें तुम हर लाओ
अपने हृदय के उपवन से कुच्छ स्नेह पुष्प तुम बरसाओ !!
वह छुद्र सही वह शुद्र सही वह तो किस्मत का मारा है
पर तेरे समान जगतपिता का वह भी एक दुलारा है !!
पूर्ब जन्म की किसी भूल की सजा को वह काट रहा है
जीवन की लम्बी दूरी को भूका नंगा नाप रहा है !
आओ हम सब मिल कर चलें, गाँधी का सपना साथ चले
हर अश्रुबून्द पोछ लायेंगे , भारत को स्वर्ग बनायेंगे !!
Tuesday, November 10, 2009
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