ना जाने कब चादर फैला , तेरे लंबे बालों का !
मैं मदमस्त पवन सा बहता, मरता तुझ पे पागल सा !!
तेरी पलकें झुकती जब तो मेरे दिल की शाम ढले !
मरना चाहूँ उस पलकों पर ,पर दिल का कुच्छ भी न चले !!
ना जाने कब चादर फैला ..............................
तेरी आँचल उरती ऐसे , मुझ पर पागल बादल सी !
तुम ना मानों लेकिन है यह एक निसानी उल्फत की !!
ना जाने कब चादर फैला .....................
महक उठी हैं फिजायें अब तो ,तेरे गेसूगंध लिए !
रोक न पाऊँ मैं ख़ुद को अब, कोई कितनी भी जंजीर कसे !!
तुझ से मिलने की ख्वाइश को , लोग लड़कपन कहते हैं !
तुझ पर मिटने की चाहत को , लोग पागलपन कहते हैं !!
माना मैं हूँ यायावर फिरता हूँ उन्माद लिए , लौट न जाऊँ घर को अपने इतनी सी फरियाद लिए !
चला था तुझ में खो जाने को पर लौट आया अवसाद लिए !!
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