कल्ह श्वेत पंख के से जो समय थे वो उर गए ,
समृतिचिन्ह लिए अब भी छितिज पर खड़ा है ।
स्वयं को धवल योग्य मत समझ ,
उथल पुथल मेंअब भी समय पड़ा है।
अगर आशीष से ही बरसती खुशियाँ
समय से छिपा , बरससा कुच्छ मांग लेता
काश यह समय जिन्दगी में कभी कम आ लेता ।
कल्ह श्वेत पंख के से जो ......................
Friday, July 3, 2009
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